BharatPedia logo
BharatPediaIndian Civilizational Encyclopedia
🌟 UNESCO World Heritage⏳ 1003 – 1010 ईस्वी (चोल साम्राज्य)

तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर: चोल साम्राज्य का महान जीवंत स्थापत्य कीर्तिमान

📅 प्रकाशित: 2026-08-14⏱️ 13 मिनट का पठन👑 राजवंश: चोल राजवंश (सम्राट राजराज चोल प्रथम)
📚 GS-1: कला एवं संस्कृति📚 GS-1: द्रविड़ मंदिर स्थापत्य📚 प्रारंभिक परीक्षा (Prelims High-Yield)
तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर: चोल साम्राज्य का महान जीवंत स्थापत्य कीर्तिमान

📜 ऐतिहासिक संक्षिप्त विवरण (Executive Snapshot)

ऐतिहासिक कालखंड1003 – 1010 ईस्वी (चोल साम्राज्य)
राजवंश / संरक्षकचोल राजवंश (सम्राट राजराज चोल प्रथम)
विषय श्रेणीमंदिर व वास्तुकला
संरक्षण वर्गीकरणयूनेस्को विश्व धरोहर

📍 Heritage Atlas & Geographic Location

🌟 UNESCO World Heritage
Historical Site / City
Peruvudaiyar Kovil, Thanjavur
State / Region
Tamil Nadu
Epoch / Era
1003 – 1010 ईस्वी (चोल साम्राज्य)
Patron Dynasty / Builder
चोल राजवंश (सम्राट राजराज चोल प्रथम)
GPS Coordinates
10.7828° N, 79.1318° E
🗺️ Open in Google Maps Heritage Atlas →

तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा में स्थित तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर (स्थानिक नाम: पेरुवुदैयार कोविल अथवा राजराजेश्वरम) चोल साम्राज्य के स्वर्ण काल का सर्वोच्च स्थापत्य प्रतीक है। महान चोल सम्राट राजराज चोल प्रथम द्वारा 1003 से 1010 ईस्वी के बीच निर्मित यह मंदिर न केवल भारत का सबसे ऊंचा द्रविड़ मंदिर है, बल्कि विश्व का पहला पूर्णतः ग्रेनाइट (All-Granite) से निर्मित देवालय भी है।

1987 में इसे यूनेस्को द्वारा 'महान जीवंत चोल मंदिर' (Great Living Chola Temples) के रूप में विश्व धरोहर घोषित किया गया। 1,000 से अधिक वर्षों से यहां आज भी निरंतर दैनिक वैदिक पूजा और उत्सव आयोजित होते हैं।


1. ग्रेनाइट का भूगर्भीय रहस्य

तंजावुर का संपूर्ण कावेरी डेल्टा अत्यंत उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी (Alluvial soil) से बना है, जहां 60 किलोमीटर की परिधि में कोई भी चट्टान या पाषाण खदान उपलब्ध नहीं है।

चोल इंजीनियरों ने 1,30,000 टन से अधिक ठोस ग्रेनाइट को त्रिची और पुदुक्कोट्टई की पहाड़ियों से कावेरी और कोलिडम नदियों के जलमार्गों पर विशेष रूप से निर्मित विशाल नौकाओं (River Barges) और हाथियों के बेड़े की सहायता से तंजावुर पहुंचाया। यह उस युग का सबसे बड़ा लॉजिस्टिक्स और परिवहन पराक्रम था।


2. 66 मीटर ऊंचा विमान और 80 टन का कुंभम

अधिकांश दक्षिण भारतीय मंदिरों में बाहरी प्रवेश द्वार (गोपुरम) ऊंचे होते हैं और गर्भगृह का शिखर छोटा रहता है। परंतु बृहदेश्वर मंदिर में राजराज चोल ने परंपरा को बदलते हुए मुख्य गर्भगृह के ऊपर स्थित विमान (Vimana) को विशालकाय बनाया:

          बृहदेश्वर मंदिर विमान की रूपरेखा
          ===============================
                       [ कलश एवं कुंभम ]
                 ▲     ~80 टन एकल ग्रेनाइट पाषाण
                ╱ ╲    
               ╱   ╲   16 स्तरों का पिरामिडीय विमान
              ╱     ╲  ऊंचाई: 66 मीटर (216 फीट)
             ╱       ╲ 
            ┌─────────┐
            │ गर्भगृह  │ 2 मंजिला आधार पाषाण
            └─────────┘ 8.7 मीटर ऊंचा महालिंगम
  • 80 टन का अखंड कुंभम: विमान के शिखर पर स्थापित अष्टकोणीय कुंभम (गुंबद) एक ही ग्रेनाइट शिलाखंड से तराशा गया है, जिसका अनुमानित वजन लगभग 80 टन है।
  • मिट्टी का विशाल रैंप: इस 80 टन के पाषाण को 66 मीटर की ऊंचाई पर स्थापित करने के लिए चोल इंजीनियरों ने मंदिर से लगभग 4 से 6 किलोमीटर दूर सारपल्लम (Sarapallam) गांव से एक धीमे ढलान वाला मिट्टी और लकड़ी का विशाल रैंप बनाया था, जिस पर हाथियों और गोल लट्ठों (Rollers) की सहायता से इस विशाल शिला को शिखर तक खींचा गया था।

3. सामाजिक और प्रशासनिक शिलालेख: जीवंत इतिहास

बृहदेश्वर मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि चोल साम्राज्य का प्रशासनिक और सांस्कृतिक केंद्र था। मंदिर की दीवारों पर उत्कीर्ण तमिल शिलालेखों में अद्वितीय विवरण मिलते हैं:

  • दानवीरों की सूची: राजराज चोल ने स्वयं अपने, अपनी बड़ी बहन कुंदवई, रानियों और सेनापतियों द्वारा दिए गए सोने, आभूषणों और भूमि के प्रत्येक ग्राम का हिसाब पत्थरों पर लिखवाया।
  • कलाकारों और कर्मचारियों के नाम: मंदिर की दीवारों पर 400 देवदासियों (नर्तकियों), दर्जनों संगीतकारों, ढोल वादकों, लेखाकारों, पुजारियों और सफाई कर्मियों के नाम, उनके घर का पता और उन्हें मिलने वाले पारिश्रमिक का स्पष्ट उल्लेख है।

4. UPSC मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण

  • द्रविड़ शैली का परिपक्व रूप: बृहदेश्वर मंदिर पल्लव काल की प्रारंभिक शैलियों से आगे बढ़कर चोल काल में द्रविड़ वास्तुकला के पूर्ण विकास को दर्शाता है।
  • मूर्तियां एवं भित्तिचित्र: गर्भगृह के चारों ओर नटराज के 108 भरतनाट्यम करणों की मूर्तियां और चोल काल के दुर्लभ मूल भित्तिचित्र (Frescoes) मौजूद हैं।
🎓

UPSC सिविल सेवा पाठ्यक्रम प्रासंगिकता (Syllabus Linkage)

यह विषय सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (GS-1: भारतीय विरासत एवं संस्कृति, इतिहास) से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित है। अभ्यर्थी ऊपर उद्धृत प्राथमिक शिलालेखों, स्थापत्य शैलियों (विमान/शिखर), एवं तत्कालीन प्रशासनिक-सैन्य मॉडलों का विशेष रूप से विश्लेषण करें।

पूर्ण UPSC GS-1 कला एवं संस्कृति पाठ्यक्रम अनुक्रमणिका देखें →
🏛️
भारतपीडिया संपादकीय परिषद (BharatPedia Editorial Council)

भारतीय पुरातत्व, अभिलेखशास्त्र (Epigraphy) और सैन्य इतिहास के शोधार्थियों द्वारा संकलित। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) उत्खनन पत्रों, एपिग्राफिया इंडिका और प्राथमिक स्रोतों पर आधारित।

🌐 Read the original English edition of this article:View in English →

संबंधित ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक शोध

कोणार्क का सूर्य मंदिर: कलिंग वास्तुकला का 'ब्लैक पैगोडा' और सौर रथ का रहस्य
मंदिर व वास्तुकला🌟 UNESCO World Heritage
⏳ लगभग 1250 ईस्वी (पूर्वी गंग राजवंश)

कोणार्क का सूर्य मंदिर: कलिंग वास्तुकला का 'ब्लैक पैगोडा' और सौर रथ का रहस्य

पूर्वी गंग राजवंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम का 1250 ईस्वी का पाषाण रथ: 24 खगोलीय धूपघड़ी पहिए, 7 अश्व और बंगाल की खाड़ी के नाविकों द्वारा दिशा निर्धारण का महाकाव्य।

📚 GS-1: Art & Culture📚 GS-1: Kalinga Architecture
⏱️ 12 min readExplore Guide →
पाटन की रानी की वाव: भूमिगत मारु-गुर्जर जल मंदिर का अद्वितीय स्थापत्य
मंदिर व वास्तुकला🌟 UNESCO World Heritage
⏳ लगभग 1063 ईस्वी (सोलंकी राजवंश)

पाटन की रानी की वाव: भूमिगत मारु-गुर्जर जल मंदिर का अद्वितीय स्थापत्य

1063 ईस्वी में रानी उदयमति द्वारा निर्मित 7-मंजिला भूमिगत जल तीर्थ: 500 से अधिक प्रधान मूर्तियां, शेषशायी विष्णु का विहंगम रूप और सूखे मरुस्थल में जल को देवतुल्य पूजने की भारतीय परंपरा।

📚 GS-1: Art & Culture📚 GS-1: Water Architecture
⏱️ 11 min readExplore Guide →
मोढेरा का सूर्य मंदिर: सोलंकी स्थापत्य कला और विषुव सौर संरेखण का विज्ञान
मंदिर व वास्तुकला🛡️ ASI Protected Monument
⏳ 1026 – 1027 ईस्वी (चालुक्य/सोलंकी राजवंश)

मोढेरा का सूर्य मंदिर: सोलंकी स्थापत्य कला और विषुव सौर संरेखण का विज्ञान

पुष्पावती नदी के तट पर स्थित 1026 ईस्वी का मारु-गुर्जर स्थापत्य चमत्कार: सूर्यकुंड की 108 लघु वेदियां, सभा मंडप के 52 नक्काशीदार खंभे और विषुव (Equinox) के दिन गर्भगृह को जगमगाती सूर्य की पहली किरण।

📚 GS-1: Art & Culture📚 GS-1: Maru-Gurjara Architecture
⏱️ 11 min readExplore Guide →