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🌟 UNESCO World Heritage⏳ 1014 – 1044 ईस्वी (सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम)

चोल नौसेना: दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय सामुद्रिक साम्राज्य एवं श्रीविजय अभियान

📅 प्रकाशित: 2026-08-29⏱️ 14 मिनट का पठन👑 राजवंश: चोल साम्राज्य नौसेना कमान
📚 GS-1: मध्यकालीन भारत📚 GS-1: प्राचीन एवं मध्यकालीन नौसेना📚 प्रारंभिक परीक्षा (Prelims High-Yield)
चोल नौसेना: दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय सामुद्रिक साम्राज्य एवं श्रीविजय अभियान

📜 ऐतिहासिक संक्षिप्त विवरण (Executive Snapshot)

ऐतिहासिक कालखंड1014 – 1044 ईस्वी (सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम)
राजवंश / संरक्षकचोल साम्राज्य नौसेना कमान
विषय श्रेणीसमुद्री इतिहास
संरक्षण वर्गीकरणयूनेस्को विश्व धरोहर

📍 Heritage Atlas & Geographic Location

🌟 UNESCO World Heritage
Historical Site / City
Nagapattinam Port, Kadaram (Kedah), Palembang
State / Region
Tamil Nadu, Malaysia, Indonesia
Epoch / Era
1014 – 1044 ईस्वी (सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम)
Patron Dynasty / Builder
चोल साम्राज्य नौसेना कमान
GPS Coordinates
10.7656° N, 79.8427° E
🗺️ Open in Google Maps Heritage Atlas →

मध्यकालीन विश्व के सैन्य इतिहास में 1025 ईस्वी का वर्ष एक युगांतकारी मोड़ था। चोल सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम के आदेश पर भारतीय नौसेना के सैकड़ों सशस्त्र युद्धपोतों ने बंगाल की खाड़ी के 2,500 किलोमीटर से अधिक खुले महासागर को पार करते हुए दक्षिण-पूर्व एशिया के शक्तिशाली श्रीविजय साम्राज्य (Srivijaya Empire—आधुनिक इंडोनेशिया, मलेशिया और दक्षिणी थाईलैंड) पर अप्रत्याशित नौसैनिक आक्रमण किया।

यह किसी भी भारतीय साम्राज्य द्वारा विदेशी धरती पर किया गया अब तक का सबसे विशाल और सफल बहु-महासागरीय सैन्य अभियान (Blue-water Naval Expedition) था, जिसने बंगाल की खाड़ी को अनौपचारिक रूप से 'चोल झील' (Chola Lake) बना दिया।


1. नौसैनिक अभियान का भू-राजनीतिक कारण

11वीं शताब्दी में भारत और सोंग राजवंश के चीन के बीच रेशम, मसाले, चीनी मिट्टी, लोहा और वस्त्रों का अरबों रुपये का समुद्री व्यापार होता था:

  1. श्रीविजय का एकाधिकार: सुमात्रा और मलय प्रायद्वीप पर शासन करने वाले शैलेंद्र वंश के श्रीविजयी शासक मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) और सुंडा जलडमरूमध्य पर कब्जा जमाए बैठे थे।
  2. भारतीय व्यापारियों पर भारी चुंगी: श्रीविजयी राजा भारतीय व्यापारी संघों (जैसे मणिग्रामम और ऐन्नूरुवर) के जहाजों पर अत्यधिक कर लगाते थे और कभी-कभी जहाजों को लूट भी लेते थे।
  3. व्यापारिक सुरक्षा: राजेंद्र चोल ने भारतीय व्यापारियों के अधिकारों की रक्षा और चीन के साथ खुले समुद्री व्यापार मार्ग को सुरक्षित करने के लिए अपनी नौसेना को सीधे श्रीविजय की राजधानी पर प्रहार करने का आदेश दिया।

2. 1025 ईस्वी का नौसैनिक युद्ध

राजेंद्र चोल का नौसैनिक बेड़ा नागपट्टिनम के विशाल बंदरगाह से रवाना हुआ। चोल जहाजों ने मानसूनी पवनों (Monsoon Trade Winds) का असाधारण लाभ उठाते हुए सुमात्रा के पश्चिमी तट से हमला किया, जहां श्रीविजयी सेना को हमले की दूर-दूर तक कोई आशंका नहीं थी:

          राजेंद्र चोल का 1025 ईस्वी नौसैनिक मार्ग
          =======================================
 [नागपट्टिनम बंदरगाह - तमिलनाडु]
              │
              ├── अंदमान और निकोबार द्वीप समूह (नक्कवरम पर विजय)
              │
              ▼
 [सुमात्रा, इंडोनेशिया (श्रीविजय की राजधानी पलेमबांग पर कब्जा)]
              │
              ├── राजा संग्राम-विजयोत्तुंगवर्मन बंदी बनाए गए
              │
              ▼
 [मलक्का जलडमरूमध्य होते हुए मलय प्रायद्वीप (केदाह / कटाह पर विजय)]
  • श्रीविजयी सम्राट बंदी: चोल नौसेना ने श्रीविजय की राजधानी पलेमबांग को घेर लिया। राजा संग्राम-विजयोत्तुंगवर्मन को उनके विशाल खजाने और आभूषणों सहित बंदी बना लिया गया।
  • 14 प्रमुख बंदरगाहों पर विजय: तंजौर के बृहदेश्वर मंदिर के शिलालेखों में चोल नौसेना द्वारा विजित 14 बंदरगाह नगरों की सूची दर्ज है—जिसमें पन्नै (सुमात्रा), मलयुर, मयिरुडिंगम, और कटाह (आधुनिक केदाह, मलेशिया) शामिल हैं।

3. चोल नौसेना का संगठन

चोल नौसेना केवल लकड़ी की नौकाओं का समूह नहीं थी, बल्कि एक अत्यंत पेशेवर सैन्य शाखा थी:

  • कप्पलू (Kappal): बड़े बहुमंजिला युद्धपोत, जिन पर तीरंदाज, भालाधारी और पत्थर फेंकने वाले कैटापल्ट (यंत्र) लगे होते थे।
  • ओडम व धरणी: तेज गति से चलने वाली नौकाएं, जो तटीय निगरानी और सूचना आदान-प्रदान का कार्य करती थीं।
  • समुद्री चार्ट और दिशा ज्ञान: चोल नाविक ध्रुव तारे और नक्षत्रों की स्थिति देखकर खुले महासागर में रात्रि के समय भी सटीक दिशा ज्ञात करने में निपुण थे।

4. UPSC मुख्य परीक्षा दृष्टिकोण

  • कोई औपनिवेशिक शोषण नहीं: चोलों ने श्रीविजय की जनता पर कोई धार्मिक अत्याचार नहीं किया, बल्कि व्यापारिक मार्ग खोलकर वापस लौट आए और पराजित राजा को करद मित्र बनाकर गद्दी पर बहाल कर दिया।
  • सांस्कृतिक प्रभाव: इस अभियान ने दक्षिण-पूर्व एशिया में हिंदू धर्म, संस्कृत भाषा, रामायण की कथाओं और मंदिर स्थापत्य की जड़ों को सदियों के लिए सुदृढ़ कर दिया।
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भारतपीडिया संपादकीय परिषद (BharatPedia Editorial Council)

भारतीय पुरातत्व, अभिलेखशास्त्र (Epigraphy) और सैन्य इतिहास के शोधार्थियों द्वारा संकलित। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) उत्खनन पत्रों, एपिग्राफिया इंडिका और प्राथमिक स्रोतों पर आधारित।

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