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🛡️ ASI Protected Monument⏳ लगभग 2400 – 1900 ईसा पूर्व (सिंधु घाटी सभ्यता)

लोथल का गोदीबाड़ा: प्राचीन सिंधु घाटी का 4,400 वर्ष पुराना हाइड्रोलिक नौसैनिक बंदरगाह

📅 प्रकाशित: 2026-07-25⏱️ 11 मिनट का पठन👑 राजवंश: हड़प्पाकालीन सामुद्रिक व्यापार संघ
📚 GS-1: प्राचीन भारत📚 GS-1: प्राचीन बंदरगाह व नौवहन📚 प्रारंभिक परीक्षा (Prelims High-Yield)
लोथल का गोदीबाड़ा: प्राचीन सिंधु घाटी का 4,400 वर्ष पुराना हाइड्रोलिक नौसैनिक बंदरगाह

📜 ऐतिहासिक संक्षिप्त विवरण (Executive Snapshot)

ऐतिहासिक कालखंडलगभग 2400 – 1900 ईसा पूर्व (सिंधु घाटी सभ्यता)
राजवंश / संरक्षकहड़प्पाकालीन सामुद्रिक व्यापार संघ
विषय श्रेणीसमुद्री इतिहास
संरक्षण वर्गीकरणASI संरक्षित राष्ट्रीय स्मारक

📍 Heritage Atlas & Geographic Location

🛡️ ASI Protected Monument
Historical Site / City
Lothal Archaeological Site, Saragwala, Dholka Taluka
State / Region
Gujarat
Epoch / Era
लगभग 2400 – 1900 ईसा पूर्व (सिंधु घाटी सभ्यता)
Patron Dynasty / Builder
हड़प्पाकालीन सामुद्रिक व्यापार संघ
GPS Coordinates
22.5222° N, 72.2494° E
🗺️ Open in Google Maps Heritage Atlas →

गुजरात के अहमदाबाद जिले में भोगवा और साबरमती नदियों के संगम के निकट स्थित लोथल का गोदीबाड़ा (Lothal Dockyard) मानव इतिहास में विश्व का सबसे पहला ज्ञात मानव-निर्मित ज्वारीय बंदरगाह (Tidal Basin) है। 1954 से 1960 के बीच प्रख्यात पुरातत्वविद् एस. आर. राव द्वारा उत्खनित यह स्थल इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि 4,400 वर्ष पूर्व भी भारतीय इंजीनियरों को ज्वार-भाटे की भौतिकी, जल दाब (Hydraulic Pressure) और नौवहन विज्ञान का गहरा ज्ञान था।

लोथल बंदरगाह ने सिंधु घाटी सभ्यता को फारस की खाड़ी, ओमान और सुदूर मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक) के समुद्री व्यापारिक मार्गों से सीधे जोड़ रखा था।


1. डॉकयार्ड की इंजीनियरिंग: 214 मीटर लंबा पकी ईंटों का बेसिन

लोथल का गोदीबाड़ा पकी हुई ईंटों की एक विशालकाय आयताकार संरचना है:

  • विशाल आयाम: यह बेसिन 214 मीटर लंबा, 36 मीटर चौड़ा और 4.5 मीटर गहरा है।
  • भूकंप और जलरोधी निर्माण: खंभात की खाड़ी के उच्च ज्वार और लहरों के दबाव को सहने के लिए इसकी दीवारों को विशेष रूप से ढलवां और जलरोधी जिप्सम-मिट्टी मोर्टार से चुना गया था।
         लोथल ज्वारीय गोदीबाड़े की कार्यप्रणाली
         ====================================
 [भोगवा नदी / खंभात की खाड़ी]
         │ (उच्च ज्वार - पानी का चढ़ाव)
         ▼
 ┌───────────────┐
 │ 7 मीटर चौड़ा  │  <-- गाद रोकने वाला sedimentation मोड़
 │ प्रवेश चैनल   │
 └───────┬───────┘
         ▼
 ┌───────────────────────────────────────────────┐
 │       214m x 36m पकी ईंटों का मुख्य बेसिन        │  <-- जहाज तैरते हुए माल उतारते थे
 └───────────────────────┬───────────────────────┘
                         ▼
             [ 1 मीटर चौड़ा निकास द्वार ]
             (लकड़ी का स्लुइस गेट - जल स्तर स्थिर रखने हेतु)

2. स्लुइस गेट और ऑटोमैटिक जल-नियंत्रण प्रणाली

खंभात की खाड़ी में विश्व के सबसे ऊंचे ज्वार-भाटे आते हैं (जहां जल स्तर 8 से 10 मीटर तक बढ़ जाता है)। यदि लोथल के इंजीनियरों ने साधारण नहर बनाई होती, तो कम ज्वार (Low Tide) के समय पानी बह जाने से जहाज कीचड़ में धंसकर टूट जाते।

इंजीनियरों ने इसका क्रांतिकारी समाधान निकाला:

  1. उच्च ज्वार पर प्रवेश: जब समुद्र में ज्वार आता था, तो जहाजों को 7 मीटर चौड़े प्रवेश चैनल से बेसिन के भीतर लाया जाता था।
  2. स्लुइस गेट (Sluice Gate): बेसिन के दक्षिणी सिरे पर ईंटों की दीवार में बनी खांचों में एक लकड़ी का फाटक (Lock Gate) लगाया गया था। जब समुद्र का पानी घटने लगता, तो फाटक गिरा दिया जाता था।
  3. सतत जल स्तर: इससे बेसिन के भीतर हमेशा न्यूनतम 2 से 3 मीटर पानी भरा रहता था, जिससे जहाज हमेशा पानी में तैरते रहते थे और उनका माल सुरक्षित उतरता था।

3. गोदाम और मनका निर्माण केंद्र

डॉकयार्ड के ठीक किनारे 3.5 मीटर ऊंचे मिट्टी के चबूतरे पर एक विशाल गोदाम (Warehouse) बनाया गया था, जिसमें 64 आयताकार ईंटों के ब्लॉक थे। यहाँ से सैकड़ों मुहरों की छाप (Sealing) मिली हैं, जो प्रमाणित करती हैं कि माल की बोरियों पर मुहर लगाकर विदेशों में भेजा जाता था।

लोथल से फारस की खाड़ी (Persian Gulf) की एक वृत्ताकार मुहर और मिस्र के गोरिल्ला की एक छोटी मूर्ति भी मिली है।


4. UPSC मुख्य बिंदु

  • उत्खननकर्ता: डॉ. एस. आर. राव (1954–1960)।
  • अन्य प्रमुख खोजें: चावल की भूसी के साक्ष्य, हाथीदांत का पैमाना (Ivory scale - माप-तौल हेतु), युगल शवाधान (Double burial)।
🎓

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भारतपीडिया संपादकीय परिषद (BharatPedia Editorial Council)

भारतीय पुरातत्व, अभिलेखशास्त्र (Epigraphy) और सैन्य इतिहास के शोधार्थियों द्वारा संकलित। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) उत्खनन पत्रों, एपिग्राफिया इंडिका और प्राथमिक स्रोतों पर आधारित।

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